कपास के घटते उत्पादन को देखते हुए भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद यानी आइसीएआर ने हरियाणा, पंजाब व राजस्थान के किसानों के लिए भारी भरकम बजट का प्रावधान किया है। जहां पर कपास के उत्पादन पर फोकस किया जाएगा। जहां पर किसानों को विभिन्न योजनाओं के माध्यम से कपास की खेती करने के लिए प्रोत्साहित किया जाएगा।
इसके अलावा किसानों के लिए ऐसे बीज विकसित किए जाएंगे, जिसमें बीमारी भी कम आएगी और उन फसलों का उत्पादन भी ज्यादा होगा। इसके लिए 5500 करोड़ रुपये का बजट का प्रावधान किया गया है।
कपास की फसल को गुलाबी सुंडी और अन्य कीटों से बचाने के लिए वैज्ञानिक सलाह के साथ फसल अवशेषों का उचित प्रबंधन जरूरी है। भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (आइसीएआर) के उप-महानिदेशक फसल विज्ञान डा. डीके यादव ने कहा कि जलवायु-अनुकूल तकनीकों, बेहतर कृषि पद्धतियों और समय पर कीट प्रबंधन से कपास की उत्पादकता बढ़ाई जा सकती है।
डा. यादव केंद्रीय कपास अनुसंधान संस्थान (सीआइसीआर) के क्षेत्रीय केंद्र सिरसा में आयोजित उत्तर भारत में जलवायु-अनुकूल कपास उत्पादन संबंधी समन्वय बैठक से पहले पत्रकारों से बातचीत कर रहे थे।
बैठक में हरियाणा, पंजाब और राजस्थान में कपास उत्पादन बढ़ाने तथा कीटों के प्रकोप से निपटने की रणनीति पर मंथन किया गया। उन्होंने बताया कि केंद्र सरकार ने कपास की उत्पादकता बढ़ाने के लिए 5500 करोड़ की लागत से राष्ट्रीय कपास उत्पादकता मिशन शुरू किया।
बीटी कपास से बढ़ी उत्पादकता
डा. यादव ने बताया कि 2002 में बीटी कपास आने के बाद लिंट की उत्पादकता लगभग 290-300 किलो प्रति हेक्टेयर से बढ़कर 2016-17 में 540-550 किलो प्रति हेक्टेयर तक पहुंची थी। अब बदलती जलवायु और कीटों की चुनौतियों को देखते हुए उन्होंने कहा कि उत्पादन बढ़ाने के लिए नई रणनीतियों की जरूरत है। इसके लिए इस वर्ष अपनाई गई कृषि पद्धतियों के प्रभाव का विश्लेषण भी किया जा रहा है। कपास उत्पादकता मिशन 2026-31 के तहत अधिक उत्पादन देने वाली और कीटों व बीमारियों के प्रति प्रतिरोधी किस्मों को बढ़ावा देने पर ध्यान दिया जा रहा है।

